Emotion - 2
संतोष क्या जो मैं थामे हूँ हथेलियों में, वही मेरा संतोष है? या यह भी एक क्षणिक छाया है जो स्पर्श बनकर भी मुझसे दूर रहती है? यह झुका हुआ मुख— क्या शांति है? या थकान की वह परत जिसमें प्रश्न चुपचाप पलते हैं? मेरे भीतर ये सूक्ष्म रेखाएँ, ये कंपन— क्या ये शब्द हैं जो जन्म लेने से पहले ही मौन हो गए? मैं खोजती हूँ— उस एक अर्थ को, जो हर रूप के पीछे छिपा है, पर हर बार यह नया रूप लेकर मुझसे ही प्रश्न कर बैठता है। हथेलियों में जो बचा है, क्या वही सत्य है? या जो फिसल गया— वही मेरा वास्तविक संतोष था? शायद यही वह प्रश्न है— जिसका उत्तर नहीं, पर जो भीतर- एक निरंतर खोज को जगाता है। रिद्धिमा