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Showing posts from March, 2026

Emotion - 2

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संतोष  क्या जो मैं थामे हूँ हथेलियों में, वही मेरा संतोष  है? या यह भी एक क्षणिक छाया है जो स्पर्श बनकर भी मुझसे दूर रहती है? यह झुका हुआ मुख— क्या शांति है? या थकान की वह परत जिसमें प्रश्न चुपचाप पलते हैं? मेरे भीतर ये सूक्ष्म रेखाएँ, ये कंपन— क्या ये शब्द हैं जो जन्म लेने से पहले ही मौन हो गए? मैं खोजती हूँ— उस एक अर्थ को, जो हर रूप के पीछे छिपा है, पर हर बार यह नया रूप लेकर मुझसे ही प्रश्न कर बैठता है। हथेलियों में जो बचा है, क्या वही सत्य है? या जो फिसल गया— वही मेरा वास्तविक संतोष  था? शायद  यही वह प्रश्न है— जिसका उत्तर नहीं, पर जो भीतर- एक निरंतर खोज को जगाता है। रिद्धिमा 

Emotion - 3

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 भावना  मैं कौन-सी लहर हूँ, जो भीतर उठती है और किनारों तक पहुँचते-पहुँचते खुद ही लौट जाती है? मेरे ही भीतर एक अनकहा वृत्त बनता है— जहाँ स्पर्श नहीं, सिर्फ स्मृति की छाया रहती है। ये आँखें— कुछ देखती नहीं, बस महसूस करती हैं एक धीमा-सा कंपन, जो शब्दों में नहीं ढलता। हृदय के इस कोमल प्रदेश में कोई स्वर नहीं, फिर भी एक संगीत है— अधूरा, पर पूर्ण-सा। मैं स्वयं से पूछती हूँ— क्या यह पीड़ा है? या एक शांत उजाला, जो भीतर ही भीतर मुझे भरता जाता है? शायद भावना  वही है— जो कहे बिना कहता है, जो छुए बिना छू लेता है, और जो खोकर भी मुझे मेरे पास लौटा देता है। रिद्धिमा

Emotion - 1

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                                    खयाल किस अनजानी दिशा से यह स्पर्श उतरता है मुझमें, कि मैं स्वयं को छूकर भी अपरिचित-सी रह जाती हूँ। यह मुख— जैसे किसी खयाल का दर्पण, जिसमें उजाला भी है और एक धुंधली-सी पीड़ा भी। आस-पास उगते ये आकार, ये रेखाएँ, ये वृत्त— क्या ये मेरे ही भीतर के अधूरे स्वर हैं जो आकार लेने को व्याकुल हैं? एक नन्हा-सा कंपन हृदय के कोने में धीरे-धीरे फैलता है— जैसे कोई मौन बीज अंधकार में भी प्रकाश खोज रहा हो। मैं स्थिर हूँ, पर भीतर ख्यालों की यात्रा चल रही है— जहाँ हर पड़ाव पर मैं कुछ खोती हूँ, और उसी में अपने को फिर से पाती हूँ। हर मौन में सुनाई देता है,  एक ख्याल,  और फिर ख्यालों में - मैं खो जाती हूँ।  तभी-- खयाल आता है कि -  खयाल रखो अपना -  इन खयालों के जंगल से।  रिद्धिमा