Emotion - 3
भावना
मैं कौन-सी लहर हूँ,
जो भीतर उठती है
और किनारों तक पहुँचते-पहुँचते
खुद ही लौट जाती है?
मेरे ही भीतर
एक अनकहा वृत्त बनता है—
जहाँ स्पर्श नहीं,
सिर्फ स्मृति की छाया रहती है।
ये आँखें—
कुछ देखती नहीं,
बस महसूस करती हैं
एक धीमा-सा कंपन,
जो शब्दों में नहीं ढलता।
हृदय के इस कोमल प्रदेश में
कोई स्वर नहीं,
फिर भी एक संगीत है—
अधूरा, पर पूर्ण-सा।
मैं स्वयं से पूछती हूँ—
क्या यह पीड़ा है?
या एक शांत उजाला,
जो भीतर ही भीतर
मुझे भरता जाता है?
शायद
भावना वही है—
जो कहे बिना कहता है,
जो छुए बिना छू लेता है,
और जो खोकर भी
मुझे मेरे पास लौटा देता है।
रिद्धिमा
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