Opulence
*Opulence* त्याग की निस्तब्धता में जो स्वर जाग उठता है, वही सच्चा वैभव है, जो मन को भीतर तक छूता है। ज्ञान की ज्योति जब अंतर्मन में दीप बन जलती है, तो बाहरी आभा स्वतः ही धुंधली पड़ चलती है। संतोष की धरती पर उगता है अमृत-सा धन, जहाँ न इच्छाओं का शोर, न अधूरा कोई मन। जहाँ कामनाएँ थमती हैं, वहीं शांति ठहरती है, वही मौन की गोद- जीवन को पूर्णता से भरती है। त्याग, ज्ञान, संतोष का यह दिव्य संगम, भीतर के शून्य में ही पाया स्वयं का आलोकन। न पाने की लालसा, न खोने का कोई भय, यही परम वैभव है- यही जीवन का सत्य। रिद्धिमा