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*सच्चा व्रत*

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  *सच्चा व्रत*   धुँधली संध्या की ओट में, मन क्यों फंसा है तृष्णाओं के बंधन में? गगन की असीम गहराइयों में, खोज उत्तर जीवन के मंतव्य में। मिट्टी के क्षणभंगुर बंधनों को, हमने ही तो जीवन का मोल कहा, स्वर्णिम क्षितिज पास था फिर भी, हमने ही तो उसे अस्वीकार किया। भीतर दीपक जलता रहता, फिर भी बाहर ज्योति खोजते, मुक्ति का द्वार खुला है बार-बार, फिर भी हम बंधनों को ही अपनाते। क्षणिक सुख के कारण, जीवन देकर ऋण चुकाना पड़ता, अमर आकाश पुकारे हमको, फिर भी मृत्यलोक हमें मीठा लगता। क्यों न आज इस जाल को तोड़ दें, जो वासनाओं से खुद हमने बुना है? क्यों न उड़ चलें उस ओर जहाँ, न कोई चाह, न कोई दु:ख शेष रहता है। मन! पहचान अपनी सत्ता को, तू असीम का अंश अनंत, त्याग दे यह लघु याचना सब, उसका हो जाना ही है तेरा सच्चा व्रत। रिद्धिमा 21/3/26 #poetry #artworld #सच्चाव्रत #रिद्धिमा riddhimaseriessrtist #RiddhimaSarrafseriesartist #

Who Am I Series

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Beyond Sight-1 मैं ही पंख बन उड़ती, मैं ही धरा में खो जाती, निशब्द ध्यान की गहराई में स्वयं को सुन पाती। वन-छाया, नील गगन—सब मेरा ही विस्तार— “मैं कौन?” पूछे मन, और मैं ही उत्तर बन जाती। II myself become wings and take flight; I myself dissolve into the earth; In the depths of wordless contemplation, I am able to hear my own self. The forest's shade, the azure sky—all are but extensions of me— "Who am I?" asks the mind, and I myself become the answer. Riddhima

Emotion - 2

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संतोष  क्या जो मैं थामे हूँ हथेलियों में, वही मेरा संतोष  है? या यह भी एक क्षणिक छाया है जो स्पर्श बनकर भी मुझसे दूर रहती है? यह झुका हुआ मुख— क्या शांति है? या थकान की वह परत जिसमें प्रश्न चुपचाप पलते हैं? मेरे भीतर ये सूक्ष्म रेखाएँ, ये कंपन— क्या ये शब्द हैं जो जन्म लेने से पहले ही मौन हो गए? मैं खोजती हूँ— उस एक अर्थ को, जो हर रूप के पीछे छिपा है, पर हर बार यह नया रूप लेकर मुझसे ही प्रश्न कर बैठता है। हथेलियों में जो बचा है, क्या वही सत्य है? या जो फिसल गया— वही मेरा वास्तविक संतोष  था? शायद  यही वह प्रश्न है— जिसका उत्तर नहीं, पर जो भीतर- एक निरंतर खोज को जगाता है। रिद्धिमा 

Emotion - 3

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 भावना  मैं कौन-सी लहर हूँ, जो भीतर उठती है और किनारों तक पहुँचते-पहुँचते खुद ही लौट जाती है? मेरे ही भीतर एक अनकहा वृत्त बनता है— जहाँ स्पर्श नहीं, सिर्फ स्मृति की छाया रहती है। ये आँखें— कुछ देखती नहीं, बस महसूस करती हैं एक धीमा-सा कंपन, जो शब्दों में नहीं ढलता। हृदय के इस कोमल प्रदेश में कोई स्वर नहीं, फिर भी एक संगीत है— अधूरा, पर पूर्ण-सा। मैं स्वयं से पूछती हूँ— क्या यह पीड़ा है? या एक शांत उजाला, जो भीतर ही भीतर मुझे भरता जाता है? शायद भावना  वही है— जो कहे बिना कहता है, जो छुए बिना छू लेता है, और जो खोकर भी मुझे मेरे पास लौटा देता है। रिद्धिमा

Emotion - 1

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                                    खयाल किस अनजानी दिशा से यह स्पर्श उतरता है मुझमें, कि मैं स्वयं को छूकर भी अपरिचित-सी रह जाती हूँ। यह मुख— जैसे किसी खयाल का दर्पण, जिसमें उजाला भी है और एक धुंधली-सी पीड़ा भी। आस-पास उगते ये आकार, ये रेखाएँ, ये वृत्त— क्या ये मेरे ही भीतर के अधूरे स्वर हैं जो आकार लेने को व्याकुल हैं? एक नन्हा-सा कंपन हृदय के कोने में धीरे-धीरे फैलता है— जैसे कोई मौन बीज अंधकार में भी प्रकाश खोज रहा हो। मैं स्थिर हूँ, पर भीतर ख्यालों की यात्रा चल रही है— जहाँ हर पड़ाव पर मैं कुछ खोती हूँ, और उसी में अपने को फिर से पाती हूँ। हर मौन में सुनाई देता है,  एक ख्याल,  और फिर ख्यालों में - मैं खो जाती हूँ।  तभी-- खयाल आता है कि -  खयाल रखो अपना -  इन खयालों के जंगल से।  रिद्धिमा 

मोहब्बत/इश्तिहार

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  मोहब्बत/इश्तिहार न मिल सकी जिसे मोहब्बत , वो इश्तिहार लगाया करें , मोहब्बत से खिले कमल भी, कभी भवरों को निमंत्रण भेजा करते हैं.... 

पिंजरे की बुलबुल

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  पिंजरे की बुलबुल छोटी सी बुलबुल लाड़ली सबकी,  अब पिंजरे में नहीं,  छोटे से लकड़ी के घर में रहती है, खुला है आसमान उसके पास, फिर क्यों बंधन में रहती है, रोज सुबह दाना-पानी समय से उसको मिलता है, और इना, मीना, और उसकी माँ से प्यार भी तो बहुत मिलता है, सोचती है कहीं और जाकर न मिला खाना और ठिकाना, तो व्यर्थ ही आज़ादी का दम्भ भरूंगी, तकलीफ ही क्या है यहां मुझको, जो यहां से दूर उड़ूँगी, बिन पिंजरे के भी वह पिंजरे की बुलबुल बन जाती है,  और हैं पंख उसके भी यह तो भूल ही जाती है...