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Wake Up Call (new poetry with same painting)

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हरित दर्पण में उलटी दुनिया की झिलमिल छाया, देखो मछली नभ में तैर रही, वन ने जल का रूप निभाया, भ्रम से बनी दुनिया हमें भरमा रही। पिंजरे हैं बस चित्रित स्मृतियाँ, बंधन कोई सत्य नहीं, उड़ते पंछी ठहरे क्षण में, कैद हुआ पर जीव नहीं। वह खड़ा अवधूत निस्पृह, दृष्टि में सत्य की ज्वाला, सत्य-असत्य की रेखा तोड़ी, बन गया स्वयं उजाला। जगत के हैं रंग फीके, टूट गया हर मोह-प्रपंच, आत्मा की नित मुक्त उड़ान, ना कोई सीमा, ना कोई बंधन। शरीर बस एक आवरण है, क्षणिक, क्षर, एक आभास, भीतर जो अविनाशी चेतन, वही अनंत, वही प्रकाश। देख लिया जब सत्य को, फिर क्या जन्म, क्या मरण का फेर, एक ही बोध में सिमट गया, जीवन का सारा अंधेर। यह संसार से विरक्ति, और "स्वयं" का जागरण है, बंधन टूटे ज्ञान से, यही मुक्ति का प्रथम चरण है। रिद्धिमा

Emotion - 8 Series work

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 अंतर्लिखित आनंद” बंद पलकें-  अंतर उजास का एक धीमा विस्तार, मौन में डूबी लेखनी खुद से ही करती संवाद अपार। न शब्दों का शोर, न बाहर का कोई आग्रह शेष, मैं लिखती हूँ स्वयं को— और खिल उठता है अंतर्मन विशेष। रिद्धिमा  “Inscribed Bliss” Closed eyelids— A gentle expansion of inner radiance; The pen, steeped in silence, Engages in a boundless dialogue with itself. No clamor of words, No lingering external demands; I write myself— And my inner self blossoms, uniquely.

Emotion -6 Series

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" सुहावना " मृदु मुस्कान में घुली प्रभा, जैसे भोर ने मन को छुआ। रेखाओं की धीमी सरगम, हर आकृति ने स्नेह रचा। पत्तों-सी हँसती हर लकीर, साँसों में मीठा सा नूर, मन का यह सुहावन आँगन, खिल उठा-निर्मल, भरपूर। रिद्धिमा  Appealing- A radiance infused within a gentle smile, As if the dawn itself had touched the soul. The soft melody of flowing lines, Every form woven with affection. Each stroke smiles like a leaf, A sweet glow resides within the breath; This enchanting courtyard of the heart Has blossomed forth-pure and abundant. Riddhima  

Emotion - 2

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संतोष  क्या जो मैं थामे हूँ हथेलियों में, वही मेरा संतोष  है? या यह भी एक क्षणिक छाया है जो स्पर्श बनकर भी मुझसे दूर रहती है? यह झुका हुआ मुख— क्या शांति है? या थकान की वह परत जिसमें प्रश्न चुपचाप पलते हैं? मेरे भीतर ये सूक्ष्म रेखाएँ, ये कंपन— क्या ये शब्द हैं जो जन्म लेने से पहले ही मौन हो गए? मैं खोजती हूँ— उस एक अर्थ को, जो हर रूप के पीछे छिपा है, पर हर बार यह नया रूप लेकर मुझसे ही प्रश्न कर बैठता है। हथेलियों में जो बचा है, क्या वही सत्य है? या जो फिसल गया— वही मेरा वास्तविक संतोष  था? शायद  यही वह प्रश्न है— जिसका उत्तर नहीं, पर जो भीतर- एक निरंतर खोज को जगाता है। रिद्धिमा