Wake Up Call (new poetry with same painting)




हरित दर्पण में उलटी दुनिया की झिलमिल छाया,
देखो मछली नभ में तैर रही,
वन ने जल का रूप निभाया,
भ्रम से बनी दुनिया हमें भरमा रही।
पिंजरे हैं बस चित्रित स्मृतियाँ,
बंधन कोई सत्य नहीं,
उड़ते पंछी ठहरे क्षण में,
कैद हुआ पर जीव नहीं।
वह खड़ा अवधूत निस्पृह,
दृष्टि में सत्य की ज्वाला,
सत्य-असत्य की रेखा तोड़ी,
बन गया स्वयं उजाला।
जगत के हैं रंग फीके,
टूट गया हर मोह-प्रपंच,
आत्मा की नित मुक्त उड़ान,
ना कोई सीमा, ना कोई बंधन।
शरीर बस एक आवरण है,
क्षणिक, क्षर, एक आभास,
भीतर जो अविनाशी चेतन,
वही अनंत, वही प्रकाश।
देख लिया जब सत्य को,
फिर क्या जन्म, क्या मरण का फेर,
एक ही बोध में सिमट गया,
जीवन का सारा अंधेर।
यह संसार से विरक्ति,
और "स्वयं" का जागरण है,
बंधन टूटे ज्ञान से,
यही मुक्ति का प्रथम चरण है।
रिद्धिमा

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