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Showing posts from April, 2026

Wake Up Call (new poetry with same painting)

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हरित दर्पण में उलटी दुनिया की झिलमिल छाया, देखो मछली नभ में तैर रही, वन ने जल का रूप निभाया, भ्रम से बनी दुनिया हमें भरमा रही। पिंजरे हैं बस चित्रित स्मृतियाँ, बंधन कोई सत्य नहीं, उड़ते पंछी ठहरे क्षण में, कैद हुआ पर जीव नहीं। वह खड़ा अवधूत निस्पृह, दृष्टि में सत्य की ज्वाला, सत्य-असत्य की रेखा तोड़ी, बन गया स्वयं उजाला। जगत के हैं रंग फीके, टूट गया हर मोह-प्रपंच, आत्मा की नित मुक्त उड़ान, ना कोई सीमा, ना कोई बंधन। शरीर बस एक आवरण है, क्षणिक, क्षर, एक आभास, भीतर जो अविनाशी चेतन, वही अनंत, वही प्रकाश। देख लिया जब सत्य को, फिर क्या जन्म, क्या मरण का फेर, एक ही बोध में सिमट गया, जीवन का सारा अंधेर। यह संसार से विरक्ति, और "स्वयं" का जागरण है, बंधन टूटे ज्ञान से, यही मुक्ति का प्रथम चरण है। रिद्धिमा

Opulence

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  *Opulence* त्याग की निस्तब्धता में जो स्वर जाग उठता है, वही सच्चा वैभव है, जो मन को भीतर तक छूता है। ज्ञान की ज्योति जब अंतर्मन में दीप बन जलती है, तो बाहरी आभा स्वतः ही धुंधली पड़ चलती है। संतोष की धरती पर उगता है अमृत-सा धन, जहाँ न इच्छाओं का शोर, न अधूरा कोई मन। जहाँ कामनाएँ थमती हैं, वहीं शांति ठहरती है, वही मौन की गोद- जीवन को पूर्णता से भरती है। त्याग, ज्ञान, संतोष का यह दिव्य संगम, भीतर के शून्य में ही पाया स्वयं का आलोकन। न पाने की लालसा, न खोने का कोई भय, यही परम वैभव है- यही जीवन का सत्य। रिद्धिमा

Emotion - 8 Series work

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 अंतर्लिखित आनंद” बंद पलकें-  अंतर उजास का एक धीमा विस्तार, मौन में डूबी लेखनी खुद से ही करती संवाद अपार। न शब्दों का शोर, न बाहर का कोई आग्रह शेष, मैं लिखती हूँ स्वयं को— और खिल उठता है अंतर्मन विशेष। रिद्धिमा  “Inscribed Bliss” Closed eyelids— A gentle expansion of inner radiance; The pen, steeped in silence, Engages in a boundless dialogue with itself. No clamor of words, No lingering external demands; I write myself— And my inner self blossoms, uniquely.

Emotion 7 series

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  अंतःस्पंदन” झुके नयन— मानो भीतर कोई प्रश्न अभी भी जाग रहा है, धीमी रोशनी में स्वरहीन संवाद आकार ले रहा है। क्या है यह— संतप्त नहीं, पर शांत भी नहीं, अंतरमन में उठता सूक्ष्म शोर, जो स्वयं में ही लय खोज रहा है। रिद्धिमा 

Connection of Art , Science and Life Series- Beauty of Life

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 सृजन की कोख लाल आकाश तले— एक मौन वृक्ष झुका है, जैसे समय स्वयं पहरा दे रहा हो। उसकी छाया में- जीवन, एक बीज की तरह सिमटा, धड़कनों में लिखता अपना आरंभ। यह केवल शिशु नहीं- कला का प्रथम स्पंदन है, जो रंगों से पहले अनुभव में जन्म लेता है। प्रकृति की गोद में विज्ञान भी एक लय बन जाता है, रेखाएँ, सूत्र, आकृतियाँ- सब उसी मौन को पढ़ती हैं। मैं बढ़ती  हूँ- न शरीर से, न समय से, बल्कि उस अदृश्य सृजन से, जो मुझमें मुझको ही रचता है। The Womb of Creation Beneath a crimson sky— A silent tree stands bowed, As if Time itself were keeping watch. Within its shade— Life, curled tight like a seed, Writes its genesis within the rhythm of heartbeats. This is no mere infant— It is the first pulse of Art, Which, preceding all color, Is born first within experience. In the lap of Nature, Even Science becomes a rhythm; Lines, formulae, forms— All read that very silence. I grow— Not through the body, nor through time, But through that invisible creation, Which, within me, creates me anew. Riddhima

Emotion -6 Series

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" सुहावना " मृदु मुस्कान में घुली प्रभा, जैसे भोर ने मन को छुआ। रेखाओं की धीमी सरगम, हर आकृति ने स्नेह रचा। पत्तों-सी हँसती हर लकीर, साँसों में मीठा सा नूर, मन का यह सुहावन आँगन, खिल उठा—निर्मल, भरपूर। रिद्धिमा  Appealing- A radiance infused within a gentle smile, As if the dawn itself had touched the soul. The soft melody of flowing lines, Every form woven with affection. Each stroke smiles like a leaf, A sweet glow resides within the breath; This enchanting courtyard of the heart Has blossomed forth—pure and abundant. Riddhima  

Who Am I Series

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Beyond Sight-5 उत्सव की मीठी धुनों के बीच, मंदिरों और ऊंची इमारतों में, मैं रहती हूँ; पेड़ों की कहानियों में और चिड़ियों के पंखों पर, मैं अकेली  रहती हूँ। हर नज़ारे के आंगन में, मैं एक मुस्कान बनकर खिलती हूँ— फिर भी, जो कुछ भी दिखता है, उससे परे, मैं अपने बेहिसाब विश्वास की गहराई में रहती हूँ। रिद्धिमा  Amidst the sweet melodies of celebration, within temples and towering structures, I dwell; In the stories of trees and upon the wings of birds, I reside in solitude. In the courtyard of every vista, I blossom forth as a smile— Yet, beyond all that is visible, I dwell within the depths of my boundless faith. Riddhima  

Emotion 5 Series

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 सृजन का वरदान” अधखिला सा चेहरा, मुस्कान की धीमी आहट लिए— जैसे प्रकृति ने अभी-अभी कोई नया स्वप्न रचा हो। रेखाएँ लताओं-सी बढ़तीं, अनगढ़ प्रकृति की कोमल उँगलियाँ बन, हर स्पर्श में जीवन की मीठी खुशबू घोलतीं। वह छोटा-सा शांति-चिन्ह— चुपचाप आशीष देता है, कि हर सृजन में छुपी रहे एक निर्मल, शांत धड़कन। “सृजन” अब शब्द नहीं, एक आह्लादित अनुभूति है— जहाँ कलाकार और प्रकृति एक-दूसरे से मिलते - जुलते लगते हैं। रिद्धिमा  “The Boon of Creation” A face, half-bloomed, bearing the faint whisper of a smile— as if Nature herself has just woven a new dream. Lines extending like vines, becoming the tender fingers of untamed Nature, infusing every touch with the sweet fragrance of life. That tiny symbol of peace— silently bestows a blessing: that within every act of creation may remain hidden a pure, tranquil heartbeat. “Creation” is no longer merely a word; it is an ecstatic experience— where the artist and Nature They seem to mirror one another. Riddhima

Emotion 4 Series

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  विखंडित स्वर” उलटी पड़ी हैं पंक्तियाँ— जैसे समय ने शब्दों को पढ़ने से मना कर दिया हो। स्याही के बीच फँसी हुई साँस, हर अक्षर आधा जन्म, आधा विस्मरण। ये जो कटे हुए स्ट्रोक्स हैं— शायद किसी ने स्मृति को बार-बार मिटाकर लिखा है। प्रकृति भी यहाँ सीधी नहीं बहती, हवा तिरछी चलती है, और पत्ते शब्दों की तरह बिखरते हैं। मैं पढ़ना चाहती हूँ— पर हर अर्थ, अपने ही भीतर सिमट कर चित्र बन जाता है। रिद्धिमा “Fragmented Voice” The lines lie overturned— as if Time itself has refused to read the words. A breath caught amidst the ink; every letter—half birth, half oblivion. These severed strokes— perhaps someone has written them by repeatedly erasing memory. Even nature here does not flow straight; the wind blows askew, and leaves scatter like words. I wish to read— yet every meaning, curling inward upon itself, transforms into an image. Riddhima

मौन

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  बहुत कुछ कहते हैं, पर हम मौन रहते हैं, जो प्यार करते हैं, वो दिल की आहट समझते हैं ... रिद्धिमा 26/2/21

Wake Up Call

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  बहुत बेचैन होकर कहा, पर जब कहा 'मैं ' केन्द्र में रहा, तुमसे वास्ता मेरा बहुत दिल के करीब रहा, पर "मैं " और "तुम " फिर भी बना रहा, गुणगान तो कुछ दिल से है तेरा किया , पर फिर भी "मैं ही हूँ " ये न मुझसे हुआ, वो तृप्त आत्मा, वो एकत्व भाव का, वो एक तिनका बचाव का, दिल में है बसा हुआ, साथ है तू मेरे, ये भी तो है तूने दिया, पर नीर छीर का भेद तो अबभी है बना हुआ , अक्स की महत्ता ने, झूठ है बना दिया, जानकर भी न जाना ये, तो सब जानकर भी, मैंने क्या है जानकर किया।। रिद्धिमा 21/3/21

परम शांति

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  एक पत्ती पर अपना हाथ टिकाकर, सुबह के सूर्य की उष्मा का आनंद लेकर, एक पुष्प भी अपना जीवन बनाता है सार्थक, ए मन अब इस परम शांति में तू भी विश्राम कर। रिद्धिमा 23/9/21

Grace 2

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  The tree looked in amazement, When the ultimate chakra comes out, Somebody learned to calm down engaged in duty, ready for enterprise, In a life made of colored wool, Colors are all - knowing this, Welcomed everyone with outstretched hands, As soon as the mind is calm, Boat in the middle of the whirlpool, The turmoil also stopped, Warped life, Like the heat of the sun in deep forest blossomed more. Riddhima 24/12/21

Who Am I Series

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Beyond Sight-3  मैं ही छाया बन भटकी, मैं ही उजियारा पाई, अपने ही रूपों की भीड़ में, स्वयं को खोज न पाई। पंख लगे हर पीड़ा को, नभ में फिर भी बंधन है— दृश्य से परे कहीं, मेरी ही मौन गहराई। I wandered as a shadow, I found the light; Yet amidst the crowd of my own forms, I could not find myself. Every pain grew wings, yet the skies remain a cage— Somewhere beyond the visible, lies my own silent depth. Riddhima

Gender Empathy

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Gender Empathy मैं ही विभाजन, मैं ही समन्वय, शिव में शक्ति, शक्ति में स्वयं। रेखाओं के इस जाल तले भी, बहता एक ही जीवन-क्रम। सूखी शाखों में भी स्पंदन, दृश्य अदृश्य का मधुर संवाद, अर्धनारी का मौन संतुलन, जाग्रत करता अंतःप्रसाद। ना स्त्री, ना पुरुष की सीमा, बस एक करुणा का विस्तार— मैं ही तुम, तुम ही मैं बनकर, रचता जग में समता का संसार। रिद्धिमा  

*सच्चा व्रत*

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  *सच्चा व्रत*   धुँधली संध्या की ओट में, मन क्यों फंसा है तृष्णाओं के बंधन में? गगन की असीम गहराइयों में, खोज उत्तर जीवन के मंतव्य में। मिट्टी के क्षणभंगुर बंधनों को, हमने ही तो जीवन का मोल कहा, स्वर्णिम क्षितिज पास था फिर भी, हमने ही तो उसे अस्वीकार किया। भीतर दीपक जलता रहता, फिर भी बाहर ज्योति खोजते, मुक्ति का द्वार खुला है बार-बार, फिर भी हम बंधनों को ही अपनाते। क्षणिक सुख के कारण, जीवन देकर ऋण चुकाना पड़ता, अमर आकाश पुकारे हमको, फिर भी मृत्यलोक हमें मीठा लगता। क्यों न आज इस जाल को तोड़ दें, जो वासनाओं से खुद हमने बुना है? क्यों न उड़ चलें उस ओर जहाँ, न कोई चाह, न कोई दु:ख शेष रहता है। मन! पहचान अपनी सत्ता को, तू असीम का अंश अनंत, त्याग दे यह लघु याचना सब, उसका हो जाना ही है तेरा सच्चा व्रत। रिद्धिमा 21/3/26 #poetry #artworld #सच्चाव्रत #रिद्धिमा riddhimaseriessrtist #RiddhimaSarrafseriesartist #

Who Am I Series

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Beyond Sight-1 मैं ही पंख बन उड़ती, मैं ही धरा में खो जाती, निशब्द ध्यान की गहराई में स्वयं को सुन पाती। वन-छाया, नील गगन—सब मेरा ही विस्तार— “मैं कौन?” पूछे मन, और मैं ही उत्तर बन जाती। II myself become wings and take flight; I myself dissolve into the earth; In the depths of wordless contemplation, I am able to hear my own self. The forest's shade, the azure sky—all are but extensions of me— "Who am I?" asks the mind, and I myself become the answer. Riddhima