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Wake Up Call (new poetry with same painting)

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हरित दर्पण में उलटी दुनिया की झिलमिल छाया, देखो मछली नभ में तैर रही, वन ने जल का रूप निभाया, भ्रम से बनी दुनिया हमें भरमा रही। पिंजरे हैं बस चित्रित स्मृतियाँ, बंधन कोई सत्य नहीं, उड़ते पंछी ठहरे क्षण में, कैद हुआ पर जीव नहीं। वह खड़ा अवधूत निस्पृह, दृष्टि में सत्य की ज्वाला, सत्य-असत्य की रेखा तोड़ी, बन गया स्वयं उजाला। जगत के हैं रंग फीके, टूट गया हर मोह-प्रपंच, आत्मा की नित मुक्त उड़ान, ना कोई सीमा, ना कोई बंधन। शरीर बस एक आवरण है, क्षणिक, क्षर, एक आभास, भीतर जो अविनाशी चेतन, वही अनंत, वही प्रकाश। देख लिया जब सत्य को, फिर क्या जन्म, क्या मरण का फेर, एक ही बोध में सिमट गया, जीवन का सारा अंधेर। यह संसार से विरक्ति, और "स्वयं" का जागरण है, बंधन टूटे ज्ञान से, यही मुक्ति का प्रथम चरण है। रिद्धिमा

तितली

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            तितली बैठ कर अक्स पर अपने तितली , आईने की तितली से कहने लगी , छोड़ कर ये ख्वाब की दुनिया , आ तुझे मैं हकीकत में गले लगा लूँ ...

जाने दीजिये न पापा

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                                                                 .. *"जाने दीजिये न पापा "* ... रेलगाड़ी की कहानी बड़ी रोमांचक थी , घूमने की इच्छा और भी प्रबल हो गई थी , एक गाडी है - जहाँ पंद्रह मिनट में दस साल बीत जाते हैं , लगभग डेड दो घंटे में सभी वापस आ जाते हैं , बस कुछ देर की ही तो बात है , आप आराम कीजिये , मैं जाकर जल्द वापस आ जाऊँगी।। पूछा पिता ने - वहाँ जाकर मुझे भूल तो न जाओगी ? नहीं पापा - आपके जैसा कोई नहीं , और फिर मैं तो आपकी लाड़ली हूँ न ? आपको कैसे भूल जाऊँगी। पिता कुछ मुस्कराये , बोले , फिर किसी दिन चली जाना। मैं थोड़ा रूठ गई - आप रोज ऐसे ही कहते हैं , दो तीन घंटे में क्या बदल जायेगा , "जाने दीजिये न पापा " कितने किस्से सुने हैं - वहाँ हजारों लोग - आपके अपने होते हैं , आप उनसे और वो आपसे प्यार करते हैं , मुझे देखना है वो सपनों का शहर , जो सपना जैसा नहीं लगता , वो रेल...