जाने दीजिये न पापा
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*"जाने दीजिये न पापा "*
...
रेलगाड़ी की कहानी बड़ी रोमांचक थी ,
घूमने की इच्छा और भी प्रबल हो गई थी ,
एक गाडी है -
जहाँ पंद्रह मिनट में दस साल बीत जाते हैं ,
लगभग डेड दो घंटे में सभी वापस आ जाते हैं ,
बस कुछ देर की ही तो बात है ,
आप आराम कीजिये ,
मैं जाकर जल्द वापस आ जाऊँगी।।
पूछा पिता ने -
वहाँ जाकर मुझे भूल तो न जाओगी ?
नहीं पापा - आपके जैसा कोई नहीं ,
और फिर मैं तो आपकी लाड़ली हूँ न ?
आपको कैसे भूल जाऊँगी।
पिता कुछ मुस्कराये ,
बोले , फिर किसी दिन चली जाना।
मैं थोड़ा रूठ गई -
आप रोज ऐसे ही कहते हैं ,
दो तीन घंटे में क्या बदल जायेगा ,
"जाने दीजिये न पापा "
कितने किस्से सुने हैं -
वहाँ हजारों लोग - आपके अपने होते हैं ,
आप उनसे और वो आपसे प्यार करते हैं ,
मुझे देखना है वो सपनों का शहर ,
जो सपना जैसा नहीं लगता ,
वो रेलगाड़ी जो भागती ही रहती है ,
जिसमें रहने वाले भी भागते रहते हैं ,
जिसमें गॉव शहर सब बनते बिगड़ते रहते हैं ,
वो छोटी - छोटी खिलौने जैसी दुनिया ,
जिसको लोग नाम से पुकारते हैं ,
मेरा एक और खिलौना है ,
यह कहकर -
मेरे जैसे बहुत सारे बच्चे हैं जो -
झुण्ड बनाकर लड़ते हैं।,
गोल है दुनिया फिर भी -
आगे निकलना है ,
मुझे तो सोचकर ही मजा आ रहा है ,
कैसे ये सारा खेल खेलते हैं।
कितना मजेदार खेल होता होगा ,
"जाने दीजिये न पापा "
यह सब देखना कितना रोमांचक होता होगा।।
...
वहाँ जाकर याद नहीं रहता -
कि सब खेल है ,
पिता ने बड़ी करुणा से समझाया ,
पर बालक मन पर बादलों को देख -
अँधेरा छाया ,
जैसे भ्रम के बादलों ने चेतना का सूर्य था छुपाया ,
मन के मयूर भी तो उन्हीं को देख कर नाचते हैं ,
आकाश जो सर्वव्याप्त है ,
उसको कहाँ हम देख पाते हैं।।
...
कहीं पिता मुझे बाँध तो नहीं रहे ?
उस अनंत रोमांचक यात्रा पर -
आखिर जाने क्योँ नहीं दे रहे ?
अन्तर्यामी ने हाथ थामा ,
और कहा चलो ठीक है ,
अपना ध्यान रखना।।
पिता की बदलती भंगिमा देख - सोचा -
कहीं ये मेरे मन की बात तो नहीं जान गए ,
...
फिर लगा अच्छा ही है ,
अब मैं मजे करुँगी ,
उस यात्रा पर जाऊँगी ,
जिसके जैसी कोई और यात्रा नहीं ,
यात्रा में यात्रा और फिर यात्रा ,
पिता स्टेशन तक छोड़ने आये ,
और रास्ते भर समझाते रहे ,
जब किसी का उतरने का स्टेशन आता है -
तो अटेंडेंट बताने आता है ,
कभी बीमारी ,कभी एक्सीडेंट ,
जब भी वह आये तो तुम मेरी याद करना,
यात्रा है यह ,
और सब कुछ सपना है ,
इस सपने में बहुत से सपने होते हैं ,
सोचना तुम सपना न होते तो -
तुम्हें सपने क्यों आते ,
बार- बार याद करना ,
वहां उसी गाडी में बैठे- बैठे ,
ट्रैक बदल जाता है ,
वापस जल्द पहुंचना है -
यह जब बिसर जाता है।
फिर सपने में सपना ,
एक जीवन से दूसरा जीवन ,
धीरे - धीरे मेरी यादों से दूर हो जाते हो ,
और जब किसी के लिए अटेंडेंट आता है ,
तो नाहक ही दुःखी हो जाते हो ,
वह यात्रा तुम देखने गए हो ,
यह बिलकुल ही भूल जाते हो ,
खिलौने की दुनिया में ,
तुम खुद खिलौना ही बन जाते हो।
पापा जैसे यूँही बोले जा रहे थे ,
अब मैं बड़ी हो गई हूँ ,
ये क्यूँ नहीं समझ पा रहे थे।
...
पापा अभी छोड़ कर ही गए थे ,
मेरी अभी थोड़ी देर पहले ही नींद लगी थी ,
और मैं चालीस की हो गई ,
ओह ! बिना जागे मैंने चालीस साल गवाँ दिए ,
ओह ! कितना पापा ने समझाया था ,
सपना है सब ,
बार - बार याद दिलाया था।
पर ये क्या मेरे दोनों तरफ ,
दो बालक थे ,
आगे से भी किसी ने हाथ थामा था।
...
खाना खा लो और बच्चों को भी खिला दो ,
ओह ! बच्चों को भी खिला दो ,
और
ओह ! मैं किसी माँ हूँ,
मेरे बच्चे भूखे हैं ,
और मैं कविता लिखे जा रही हूँ।।
रिद्धिमा
२३- ०५ - २०२१

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