*सच्चा व्रत*
*सच्चा व्रत*
धुँधली संध्या की ओट में,
मन क्यों फंसा है तृष्णाओं के बंधन में?
गगन की असीम गहराइयों में,
खोज उत्तर जीवन के मंतव्य में।
मिट्टी के क्षणभंगुर बंधनों को,
हमने ही तो जीवन का मोल कहा,
स्वर्णिम क्षितिज पास था फिर भी,
हमने ही तो उसे अस्वीकार किया।
भीतर दीपक जलता रहता,
फिर भी बाहर ज्योति खोजते,
मुक्ति का द्वार खुला है बार-बार,
फिर भी हम बंधनों को ही अपनाते।
क्षणिक सुख के कारण,
जीवन देकर ऋण चुकाना पड़ता,
अमर आकाश पुकारे हमको,
फिर भी मृत्यलोक हमें मीठा लगता।
क्यों न आज इस जाल को तोड़ दें,
जो वासनाओं से खुद हमने बुना है?
क्यों न उड़ चलें उस ओर जहाँ,
न कोई चाह, न कोई दु:ख शेष रहता है।
मन! पहचान अपनी सत्ता को,
तू असीम का अंश अनंत,
त्याग दे यह लघु याचना सब,
उसका हो जाना ही है तेरा सच्चा व्रत।
रिद्धिमा
21/3/26
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