Gender Empathy
Gender Empathy
मैं ही विभाजन, मैं ही समन्वय,
शिव में शक्ति, शक्ति में स्वयं।
रेखाओं के इस जाल तले भी,
बहता एक ही जीवन-क्रम।
सूखी शाखों में भी स्पंदन,
दृश्य अदृश्य का मधुर संवाद,
अर्धनारी का मौन संतुलन,
जाग्रत करता अंतःप्रसाद।
ना स्त्री, ना पुरुष की सीमा,
बस एक करुणा का विस्तार—
मैं ही तुम, तुम ही मैं बनकर,
रचता जग में समता का संसार।
रिद्धिमा
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