Emotion - 1
खयाल
किस अनजानी दिशा से
यह स्पर्श उतरता है मुझमें,
कि मैं स्वयं को छूकर भी
अपरिचित-सी रह जाती हूँ।
यह मुख—
जैसे किसी खयाल का दर्पण,
जिसमें उजाला भी है
और एक धुंधली-सी पीड़ा भी।
आस-पास उगते ये आकार,
ये रेखाएँ, ये वृत्त—
क्या ये मेरे ही भीतर के
अधूरे स्वर हैं
जो आकार लेने को व्याकुल हैं?
एक नन्हा-सा कंपन
हृदय के कोने में
धीरे-धीरे फैलता है—
जैसे कोई मौन बीज
अंधकार में भी
प्रकाश खोज रहा हो।
मैं स्थिर हूँ,
पर भीतर ख्यालों की यात्रा चल रही है—
जहाँ हर पड़ाव पर
मैं कुछ खोती हूँ,
और उसी में
अपने को फिर से पाती हूँ।
हर मौन में सुनाई देता है,
एक ख्याल,
और फिर ख्यालों में - मैं खो जाती हूँ।
तभी--
खयाल आता है कि -
खयाल रखो अपना -
इन खयालों के जंगल से।
रिद्धिमा
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