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मेरा देश विश्वविजयी कैसे बन सकता है ?

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 .. मेरा देश विश्वविजयी कैसे बन सकता है ?  स्वीकार है मुझे जेल में रहना, स्वीकार है मुझे फांसी पर लटकना, स्वीकार है सब कुछ स्वराज के लिए जो है मेरा सपना, स्वीकार है सब कुछ अब नये स्वतंत्र भारत को है देखना, आज़ाद हिन्द फौज की गाथाएँ, जो शौर्य को जगाती हैं, पिता जी ये कथाएं हमें क्यों नहीं पढाई जाती हैं ?  पिता जी कुछ मौन थे, देश के इतिहास में ये कुर्बानी की कहानीयाँ  बच्चों तक क्यों नहीं है, सोच ही रहे थे, कि नन्ही लक्ष्मी ने फिर पूछा, पिता जी देश आज़ाद हो गया, तो क्या अब हम मनमानी के लिए  स्वतंत्र हैं ? पिता ने कहा-  स्वछंद और स्वतंत्र में अंतर होता है, महिमा और मर्यादा न हो भंग, ये भी ध्यान रखना होता है, लक्ष्मी ने फिर कहा- ये महिमा और मर्यादा क्या होती है? पिता ने उत्तर दिया- योग, संस्कृति और विज्ञान से, देश की महिमा उजागर होती है, चोरी, भ्रष्टाचारी , संविधान के  खण्डन से, देश की मर्यादा उल्लंघित होती है, तभी एक बात और दिमाग में आई, और लक्ष्मी कुछ उत्साहित होकर बोली, मेरा देश विश्वविजयी कैसे बन सकता है ? अब इस प्रश्न का उत्तर,  हम सब पर आता है, कह...
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  .. Sigmund Freud’s Journey from ‘Libido’ Theory to the ‘Unconscious’ Theory in Art https://www.ijariit.com/manuscripts/v7i4/V7I4-1451.pdf link -   Author Ridhi Sarraf Riddhima   International renowned artist and awarded with fellowship by culture ministry of India From time to time all art and aesthetics reflect the current intellectual trends of their time. Sigmund Freud of Austria, a revolutionary, the great physician of the human mind, the founder of psychoanalysis, was not only a neurologist, psychiatrist, but also a philosopher, writer, poet. In short, he did not leave any subject untouched. Sigmund Freud discussed psychoanalysis as a way to deal with psychopaths and as an intellectual discipline.   A kind of upheaval or revolution of ideas was by Sigmund Freud a medical man who founded the science of psychoanalysis. Psychoanalysis initially emerged as a technique to treat mental illness, which was related to mental diseases. Then Freud tried...

माटी का बैभव

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 ..       माटी का वैभव   प्रबल है नियति का खेल , अगोचर कर्म की धारा , रहना है सचेत , और गुदड़ी के लाल को भी है जानना , कहते हैं सूर्य रेखा से होते हैं सम्पन्न , पर पुत्र उन्हीं का रहा आजन्म खिन्न , बहुत दूर लगती है प्रसन्नता , नहीं भाती कभी कभी तो भव्यता , जैसे थी उर्मिला के लिए अयोध्या , ऐसे नहीं भाती पिया बिना बिछौने की कोमलता , अर्थ कीर्ति का लोभ है भैरव , लेकिन फिर भी सब है माटी का वैभव।  आभार  रिद्धिमा  १८-०७-२०२१ 

सब कुछ एक ही है

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 .. सब कुछ एक ही है                                               सब कुछ एक ही है  पृथ्वी से काया , सूर्य से ऊर्जा , चंद्र से रस , जल से जीवन , आकाश से वृद्धि , एक छोटे से पत्ते में , समस्त पंचभूतों के साथ , अंतरिक्ष और ब्रह्माण्ड, सब समाया है।  सब कुछ एक ही है , और इसी से तो , अद्वैत का भाव आया है।  अपने ही पुत्र , पत्नी माँ को दीक्षित करना , फिर एक - एक कर सबको जाते देखना , निश्चित ही मंदिर के , भगवान की मूरत ही पूजनीय है , पर यह मंदिर जिसमें भगवान रहते हैं , उसका क्या ? हाँ भगवान हैं , इसीलिए तो मंदिर है ।  रिद्धिमा 

जाने दीजिये न पापा

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                                                                 .. *"जाने दीजिये न पापा "* ... रेलगाड़ी की कहानी बड़ी रोमांचक थी , घूमने की इच्छा और भी प्रबल हो गई थी , एक गाडी है - जहाँ पंद्रह मिनट में दस साल बीत जाते हैं , लगभग डेड दो घंटे में सभी वापस आ जाते हैं , बस कुछ देर की ही तो बात है , आप आराम कीजिये , मैं जाकर जल्द वापस आ जाऊँगी।। पूछा पिता ने - वहाँ जाकर मुझे भूल तो न जाओगी ? नहीं पापा - आपके जैसा कोई नहीं , और फिर मैं तो आपकी लाड़ली हूँ न ? आपको कैसे भूल जाऊँगी। पिता कुछ मुस्कराये , बोले , फिर किसी दिन चली जाना। मैं थोड़ा रूठ गई - आप रोज ऐसे ही कहते हैं , दो तीन घंटे में क्या बदल जायेगा , "जाने दीजिये न पापा " कितने किस्से सुने हैं - वहाँ हजारों लोग - आपके अपने होते हैं , आप उनसे और वो आपसे प्यार करते हैं , मुझे देखना है वो सपनों का शहर , जो सपना जैसा नहीं लगता , वो रेल...

Grace 6

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                                                       ..                                                   Grace - 6                                                           Grace  अरण्य से गुजरते मन्त्रहीन विचारों के जाल से दूर दूर दूर तक फैली पूरी तरह से अनछुई सी एक पेड़ की शाखाएँ देख मैं धीरे से बैठ गई  अचानक एक पत्ती की खुशबू  मेरे विचारशून्य मन को बिना कुरेदे आनंद का आभास देने लगी तरंगें जैसे झूला झुला रही थी वो जंगल की नीरवता और गहन हो गई ध्यान देने पर भी वहाँ बस वह खुशबू  ही रह गई रिद्धिमा 16 - 06 - 2021

किरदार

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                                                         ..                                                      किरदार धर्म युद्ध में अधर्म के साथ खड़े होकर , अपना धर्म निभा रहे थे , चारों ओर से तीर भाले तलवार चलाये जा रहे थे , या तो ढेर होगा अर्जुन , या कृष्ण प्रतिज्ञा टूटेगी ,  भीष्म प्रतिज्ञा सुन , कैसे गुडाकेष को निद्रा आएगी , पर वो तो सोता था गहरी निद्रा में , भरोसा था अटल कि है वह हरी की क्षत्र छाया में , चारों ओर हा - हा कार मच गया था , मानवता से मनुष्य का विश्वास उठ गया था , पाला पोसा , जिन हाथों से खिलाया था , मार दुँगा उसे ऐसा संकल्प कैसे उठाया था , बहुत रोष में पितामह आ गये थे , तीर पर तीर मारकर व्यग्र किये और हुए जा रहे थे , नेत्र कृष्ण के लाल हो गए थे , देख भक्त पर विपति कृष्ण बेहाल हो गए थे , ...